स्वाभिमान और बलिदान की अमर गाथा

स्वाभिमान और बलिदान की अमर गाथा

डॉ. आशालता

स्वाभिमान और बलिदान की अमर गाथास्वाभिमान और बलिदान की अमर गाथा

चित्तौड़गढ़, यह नाम लेते ही आंखों के सामने वीरता, बलिदान और स्वाभिमान की ऐसी तस्वीर उभरती है, जिसने इस भूमि को अमर बना दिया। राजस्थान की इस पावन धरा ने शौर्य की अनेक अमर गाथाएं रची हैं। इस पुण्यभूमि की रक्षा के लिए पुरुषों ने केसरिया किया तो काम लोलुप मुस्लिम आक्रांताओं से अपने सतीत्व की रक्षा हेतु महिलाओं ने अग्नि की ज्वाला में प्रवेश कर जौहर किया। चित्तौड़ ने तीन बार साका यानि केसरिया और जौहर का दंश सहा, लेकिन जीते जी मातृभूमि को आंच नहीं आने दी। इनमें सबसे बड़ा जौहर चित्तौड़ का द्वितीय जौहर था, जब रानी कर्णावती के नेतृत्व में हजारों वीरांगनाएं आत्मगौरव की रक्षा के लिए अग्नि में कूद गईं।

चित्तौड़ का द्वितीय जौहर प्रथम जौहर के 232 वर्ष बाद विक्रम संवत 1592 (चैत्र कृष्ण नवमी / 8 मार्च 1535) में हुआ था, जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया। महाराणा सांगा के निधन के बाद मेवाड़ की स्थिति कमजोर हो गई थी। उनके पुत्र महाराणा विक्रमादित्य उस समय अल्पवयस्क थे और शासन की बागडोर मुख्यतः उनकी माता रानी कर्णावती के हाथों में थी। बहादुर शाह ने इस स्थिति का फायदा उठाकर चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी।

बहादुर शाह का उद्देश्य केवल चित्तौड़ पर विजय प्राप्त करना नहीं था, बल्कि वह चित्तौड़ की आत्मा और स्वाभिमान को कुचलना चाहता था। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि चित्तौड़ की माटी में जन्मी वीरांगनाएं मौत को गले लगाना स्वीकार करेंगी, पर अपमान नहीं सहेंगी।

बहादुर शाह की विशाल सेना ने महीनों तक चित्तौड़ को घेरकर रखा। किले के भीतर धीरे-धीरे अनाज और जल का संकट बढ़ता गया। रानी कर्णावती ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए दुश्मन के इरादों को भांप लिया। जब यह स्पष्ट हो गया कि अब किला ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकेगा और बहादुर शाह की सेना किले में प्रवेश कर जाएगी, तब रानी कर्णावती ने जौहर का निर्णय लिया। उन्होंने चित्तौड़ की हजारों राजपूत स्त्रियों को इकट्ठा किया और उन्हें आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जौहर कुंड में समर्पित होने का आह्वान किया। दूसरी ओर पुरुषों ने केसरिया धारण कर अंतिम सांस तक मातृभूमि की रक्षा का संकल्प लिया।

“अग्नि की लपटें शरीर को भस्म कर सकती हैं, पर आत्मा को नहीं।”

चित्तौड़ की वीरांगनाएं आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जौहर कुंड की ओर बढ़ने लगीं। उन्होंने अपने प्रियजनों को अंतिम प्रणाम किया और अग्नि को गले लगाकर अपनी पवित्रता की रक्षा की।

जौहर के बाद केसरिया बाना पहने रणबांकुरे हाथों में तलवारें लेकर, दुश्मन से अंतिम युद्ध करने के लिए रणभूमि में कूद पड़े। चित्तौड़ के वीर योद्धाओं ने अंतिम सांस तक युद्ध किया और अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि की रक्षा का धर्म निभाया।

रानी कर्णावती के बलिदान ने यह साबित कर दिया कि स्त्री केवल सौंदर्य और कोमलता की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि साहस, त्याग और स्वाभिमान की जीवंत मूर्ति भी है।

बहादुर शाह की सेना जब चित्तौड़ पहुंची, तब तक सब कुछ समाप्त हो चुका था। रानी कर्णावती का जौहर और चित्तौड़ की वीरांगनाओं का बलिदान इतिहास में अमर हो चुका था। चित्तौड़ का द्वितीय जौहर आज भी राजस्थान की लोककथाओं और लोकगीतों में जीवित है।

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