गरीबी मजहबी नहीं होती

हृदयनारायण दीक्षित
गरीबी मजहबी नहीं होती
गरीबी मजहबी नहीं होती। स्थाई भी नहीं होती। जो आज गरीब हैं या कल तक गरीब थे, वे अपने प्रयत्नों व राष्ट्र राज्य की आर्थिक कार्यवाही से धन संपन्न हो जाते हैं। इसलिए गरीबों, वंचितों के लिए रक्षोपाय तय करते समय पंथ, मजहब का विचार अनुचित है, अलगाववादी है और संविधान विरोधी भी है। बावजूद इसके कर्नाटक राज्य सरकार ने सरकारी ठेकों में मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण का अधिनियम बनाया है। सामान्यतया आरक्षण वंचितों को संपन्न बनाने का उपकरण रहा है। लेकिन कर्नाटक सरकार के मुस्लिम आरक्षण से संपन्न और शक्तिशाली मुसलमानों को और शक्तिशाली बनाने का इरादा है। यह पहला अवसर नहीं है। मुस्लिम वोट बैंक तुष्टीकरण कथित सेकुलर राजनीति का स्थाई मिशन है। संविधान विरोधी होने के कारण मजहब आधारित आरक्षण के प्रस्तावों को न्यायालयों ने कई बार असंवैधानिक बताया है। तो भी मजहबी तुष्टिकरण का खतरनाक खेल जारी है। भाजपा ने इस आरक्षण का तीव्र विरोध किया है। कांग्रेस बैकफुट पर है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आवश्यक संविधान संशोधन की बात भी कही है।
मजहबी आरक्षण का यह प्रयास पहला नहीं है। कर्नाटक में ही इसके पहले भी इसी तरह के प्रयास हुए हैं। संविधान विरोधी ये प्रयास सफल नहीं हुए। वर्ष 2005 में केन्द्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 50 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण की घोषणा की थी। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने इसकी तरफदारी की थी। जमीयत उलेमा ए हिन्द ने विशाल रैली में मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी। सोनिया गांधी ने भी प्रतिबद्धता प्रकट की थी। मुस्लिम यूनिवर्सिटी के आरक्षण प्रस्ताव को लेकर अर्जुन सिंह की आलोचना हुई थी। यूनिवर्सिटी लंबे समय तक अलगाववाद के लिए राष्ट्रवादियों के निशाने पर रही है। मोहम्मद करीम छागला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मंत्री थे। वह भी सांप्रदायिक तत्वों के निशाने पर आए। उन्होंने अपनी पुस्तक ’रोजेस इन दिसंबर’ में लिखा कि, ”मैंने स्पष्ट कहा था कि विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संस्था है।” कट्टरपंथी मुसलमानों ने छागला का भी विरोध किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने इस यूनिवर्सिटी को इस्लामी शस्त्रागार बताया था। आगा खां ने इसे पाकिस्तानी विचारधारा का जन्म स्थान बताया था। 1980 के दशक में ऑल इंडिया मुस्लिम सम्मेलन में विधायिका और नौकरियों में मजहब आधारित आरक्षण मांगा गया था। 1983 में मुस्लिम लीग ने केरल में मुस्लिम आरक्षण की यही मांगे दोहराई थीं। 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और जनता दल ने मुस्लिम आरक्षण का चुनावी वादा किया था। आंध्र प्रदेश की सरकार ने भी मुस्लिम आरक्षण किया था।
संविधान की उद्देशिका और अनुच्छेद 15 व 16 में धर्म और पंथ आधारित भेद का निषेध है। मुस्लिम आरक्षण अनुच्छेद 15 व 16 का उल्लंघन है। संविधान निर्माता पंथ और मजहब आधारित विशेषाधिकारों के विरोधी थे। सभा के सदस्य मजहब आधारित भारत विभाजन से आहत थे। मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों को अलग राष्ट्र मानते थे। वे भारत के भीतर दो राष्ट्र देखते थे। अलग मुस्लिम देश की मांग पर भयंकर रक्तपात हुआ था। लाखों लोग मारे गए थे। देश बंट गया था। संविधान सभा इसी वातावरण में संविधान बना रही थी। मुस्लिम आरक्षण का विषय सभा में आया। सभा ने गहन अध्ययन के लिए अल्पसंख्यक अधिकारों सम्बंधी समिति का गठन किया था। सरदार पटेल समिति के सभापति थे। पटेल कमेटी ने अनेक पक्षों से साक्ष्य लेकर (25 मई 1949) सभा में अपनी रिपोर्ट रखी। सभा में जेड. एच. लारी ने मुस्लिम आरक्षण की मांग करते हुए कहा कि, ”आपको अनुसूचित जातियों के हितों की चिन्ता है, लेकिन मुस्लिम हितों की नहीं।” एक मुस्लिम सदस्य नजीरुद्दीन अहमद ने कहा कि, ”किसी प्रकार के रक्षण स्वस्थ राजनैतिक विकास के प्रतिकूल हैं।
पंथ मजहब आधारित निर्णय उचित नहीं होते। जगत नारायण लाल ने कहा कि, ”भारत एक सेकुलर राज्य होगा। अब आरक्षण की मांग नहीं होनी चाहिए।” सभा में दो दिन बहस हुई। एक मुस्लिम सदस्य बी. पोकर ने धमकाते हुए मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की और कहा, ”मुसलमान शक्तिशाली और संगठित हैं। यदि उन्हें लगा कि उनकी आवाज नहीं सुनी गई, तो वे उद्दण्ड हो सकते हैं।” संविधान सभा में भी मुसलमानों की उद्दण्डता की धमकी ध्यान देने योग्य है। डॉ. आम्बेडकर ने उनकी उद्दण्डता का उल्लेख कई बार किया है। डॉक्टर आम्बेडकर मजहबी अलगाववाद के विरोधी थे। ए. आयंगर प्रख्यात विधिवेत्ता ने कहा, ”मेरा अनुमान था कि पाकिस्तान प्राप्त करने के बाद मुस्लिम दोस्त अपना व्यवहार बदलेंगे।” सभा के उपाध्यक्ष एच. सी. मुखर्जी ने दो टूक बात की और कहा, ”हम एक राष्ट्र चाहते हैं। तो मजहब के आधार पर कोई मानता नहीं दे सकते। संविधान सभा के कुछ मुस्लिम सदस्य मौलाना हजरत मोहानी, तजम्मुल हुसैन, नजीरुद्दीन अहमद आदि पंथ आधारित आरक्षण के पक्ष में नहीं थे। सभापति सरदार पटेल ने बहस का उत्तर दिया और कहा, ”समिति के अध्ययन का निष्कर्ष है कि मुस्लिम बंधुओ ने आरक्षण की मांग पर बल नहीं दिया है।” कई मुस्लिम सदस्यों ने आपत्ति की। कहा गया कि मुस्लिम ताकतवर हैं। संगठित हैं। बादशाह रहे हैं। उन्हें कमजोर न मानें। इस पर पटेल ने कहा, ”आपका समाज संगठित है। शक्तिशाली है। तो आप विशेष सुविधाएं क्यों मांगते हैं। जो अल्पमत देश विभाजन करा सकता है। वह अल्पमत नहीं हो सकता। अतीत भूलिए। अगर आपको ऐसा असंभव लगता है तो आप अपने विचार के अनुसार किसी सुंदर स्थान पर चले जाइए। नेहरू ने कहा, “सभी वर्ग अपनी अपनी विचारधारा के अनुसार गुट बना सकते हैं, लेकिन पंथ, मजहब आधारित अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। मैं यहां तक कहता हूं कि जो रक्षण रह गए हों, वह भी समाप्त कर दिए जाएं। वर्तमान परिस्थितियों में अनुसूचित जाति के आरक्षण को हटाना सही नहीं होगा।”
संविधान निर्माता मजहब आधारित विशेषाधिकारों के विरोधी थे। पटेल मजहबी अलगाववाद और पंथिक अस्मिता के विरोधी थे। संविधान सभा की मसौदा समिति के सभापति डॉ. आम्बेडकर सभी तरह की सांप्रदायिकता के विरोधी थे। मूलभूत प्रश्न है कि क्या नेहरू के मजहबी आरक्षण विरोधी विचार का प्रभाव सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि कांग्रेस जनों पर भी नहीं पड़ता? क्या डॉक्टर आम्बेडकर के नाम पर वोट मांगने वाले दल समूहों को मुस्लिम आरक्षण का विरोधी नहीं होना चाहिए। संविधान सभा में डॉक्टर आम्बेडकर, राधाकृष्णन, आयंगर आदि प्रतिष्ठित विद्वान मजहबी अस्मिता के घातक परिणामों के जानकार थे। पंडित नेहरू भी बहुपठित थे। डॉ. आम्बेडकर और उनके सामने दुनिया के कई देशों के आरक्षण सम्बंधी मॉडल थे। वे भारत की सामाजिक संरचना से भिन्न हैं। भारत में जाति आधारित भेदभाव रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने व्यथित, वंचित अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिया। वह भी सुनिश्चित अवधि के लिए। मुस्लिम किसी भी देश में सामाजिक आर्थिक दृष्टि से वंचित नहीं हैं। वे भारत में लगभग 600 वर्ष तक सत्ताधीश रहे हैं। वे सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं। इस सब के बावजूद वोट बैंक तुष्टीकरण के लिए बार-बार मुस्लिम आरक्षण की असंवैधानिक मांग की जाती है। संविधान निर्माताओं ने अपनी ओर से इस विषय का निस्तारण कर दिया था। भारतीय राष्ट्रराज्य को भी इसका अंतिम निस्तारण करना चाहिए। जो स्वयं संविधान नहीं मानते, उन्हें राष्ट्र सर्वोपरिता समझाना कठिन है।