छत्रपति शिवाजी महाराज भारतवर्ष की शाश्वत विजय के प्रेरणास्रोत हैं- सरसंघचालक

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतवर्ष की शाश्वत विजय के प्रेरणास्रोत हैं- सरसंघचालक

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतवर्ष की शाश्वत विजय के प्रेरणास्रोत हैं- सरसंघचालकछत्रपति शिवाजी महाराज भारतवर्ष की शाश्वत विजय के प्रेरणास्रोत हैं- सरसंघचालक

नागपुर, 3 मार्च। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज भारतवर्ष की शाश्वत विजय के प्रेरणास्रोत हैं। शिव-चरित्र के अध्ययन से हम उनके ऋणानुबंध से जुड़ जाते हैं। शिव-चरित्र सतत संघर्ष की प्रेरणा देता है। इसलिए उन्हें युगंधर, युग प्रवर्तक और युग पुरुष कहा जाता है। एक व्यक्ति और राजा के रूप में शिवाजी महाराज का चरित्र अनुकरणीय है।

सरसंघचालक ने ये विचार नागपुर स्थित मुंडले सभागृह में ‘युगंधर शिवराय’ पुस्तक विमोचन समारोह के अवसर पर व्यक्त किए। स्व. डॉ. सुमंत टेकाडे द्वारा लिखित पुस्तक का सम्पादन डॉ. श्याम माधव धोंड ने किया है। इस दौरान मंच पर राजे मुधोजीराजे भोसले, पुस्तक के सम्पादक श्याम धोंड, प्रकाशक सचिन उपाध्याय, शिवराज्याभिषेक समारोह समिति के दत्ता शिर्के, माधवी टेकाड़े और दत्ता टेकाड़े उपस्थित थे।

मुंडले सभागृह में आयोजित समारोह में उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज से प्रभावित होकर रविन्द्रनाथ टैगोर ने कविता लिखी, स्वामी विवेकानन्द ने उनकी कथा सुनाई। यहाँ तक कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के अभिनेता गणेशन ने शिवाजी महाराज के नाटक में उनकी भूमिका निभाई तो उनका नाम भी शिवाजी गणेशन हो गया। शिवाजी महाराज ने सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रभावित किया है।

उन्होंने कहा, पौराणिक युग के हमारे आदर्श हनुमान जी हैं तो आधुनिक युग में हमारे आदर्श शिवाजी महाराज हैं।

डॉ. सुमंत टेकाडे ने शिव-चरित्र को अपना जीवित कार्य क्यों बनाया, इस बात पर हमें विचार करना चाहिए। शिव-चरित्र लोगों के मनोरंजन के लिए नहीं है, वरन शिवाजी महाराज के आदर्श जीवन को जीने के लिए बना है। डॉ. सुमंत टेकाड़े ने शिव-चरित्र के अध्ययन का आदर्श प्रस्तुत किया है। डॉ. सुमंत ने जब छत्रपति का अध्ययन किया तो वे शिव-चरित्र से पूर्णतः एकाकार हो गए थे। इसलिए जब वे शिव-चरित्र की कथा सुनाते तो उनके शब्द सीधे श्रोताओं के हृदय को झकझोरते थे, उनके मन-मस्तिष्क को प्रभावित करते थे। चरित्र में तन्मय हो जाने से अपना सामर्थ्य बढ़ता है।

सरसंघचालक ने कहा कि वक्ता के भाषण पर ताली बजने से अथवा लेखक के पुस्तक की प्रशंसा होने में वक्ता या लेखक की सफलता नहीं है। उनके विचारों से लोग जब कार्य के लिए प्रवृत्त हो जाते हैं, उसी में वक्ता या लेखक के जीवित कार्य की सार्थकता है।

इससे पूर्व डॉ. श्याम धोंड ने पुस्तक लेखन यात्रा पर प्रकाश डाला। मुधोजीराजे भोसले ने सुमंत टेकाड़े की अध्ययनशील शैली पर प्रकाश डाला। माणिक ढोले ने स्व. डॉ. सुमंत टेकाड़े के जीवन यात्रा से श्रोताओं को अवगत कराया। वहीं वैशाली उपाध्याय ने शिव-महिमा स्तोत्र प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सतीश चाफले ने किया तथा दत्ता शिर्के ने आभार व्यक्त किया।

युगंधर शिवराय’ पुस्तक विमोचन

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