सत्ता के लिए जमीन तलाशते रामजी लाल सुमन

अजय सेतिया
सत्ता के लिए जमीन तलाशते रामजी लाल सुमन
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन ने राज्यसभा में कहा कि भाजपा वाले भारत के मुसलमानों को बाबर की औलाद कह कर उन्हें पाकिस्तान चले जाने को कहते हैं, लेकिन जिस हिन्दू गद्दार राणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को भारत में आमंत्रित किया था, उसके बारे में कुछ नहीं कहते। रामजी लाल सुमन ने देश भर में हल्ला हो जाने के बाद पहले अपने बयान पर खेद प्रकट कर लिया था, लेकिन बाद में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उनका समर्थन करते हुए अपने बयान पर अड़े रहने को कहा, तो सुमन ने कहा कि उन्होंने खेद प्रकट किया है, क्षमा नहीं मांगी। इसके बाद उन्होंने खेद वाले बयान से पूरी तरह पलटते हुए यहाँ तक कहा कि वह इस जन्म में तो क्षमा नहीं मागेंगे। जब वह अपने बयान पर डट गए तो हैदराबाद से लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवेसी ने भी रामजी लाल सुमन वाला बयान हू-ब-हू दोहराते हुए कहा कि रामजी लाल सुमन ने इतिहास का सच देश के सामने रखा है। लेकिन क्या यह इतिहास का सच है? किसी भी इतिहासकार ने इसकी पुष्टि नहीं की है।
पिछले दिनों बाबरनामा के हवाले से व्हाट्सएप पर यह बात अवश्य कही गई थी, जिसे मुस्लिम वर्ग ने सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित किया। लगता है इंडी एलायंस के जो नेता व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का दिन रात राग अलाप कर भाजपा वालों की आलोचना करते थे, रामजी लाल सुमन उसी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के अधकचरे ज्ञान का शिकार हुर हैं। जहां तक असदुद्दीन ओवेसी का प्रश्न है, तो वह उन्हीं लोगों में से हैं, जो ताल ठोक कर कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने देश पर 500 वर्ष राज किया है, यानि वह मुगल काल को अपने पूर्वजों का राज मानते है, इसलिए स्वयं को बाबर का वंशज मानते हैं। लेकिन इतिहासकार इस बात की पुष्टि नहीं करते कि मेवाड़ के शासक संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को भारत आने का न्योता दिया था। इब्राहीम लोदी दिल्ली का सुलतान था। दिल्ली पर लोदी वंश का राज 1451 में शुरू हुआ था। पश्तून लोदी जनजाति का सरदार बहलोल खान पंजाब के सरहिंद का गवर्नर था। वह अफगान शाही परिवार से सम्बंध रखता था। उसने 1451 में सैय्यद वंश का स्थान लेते हुए दिल्ली सल्तनत पर शासन शुरू किया था। लोदी परिवार को विदेशी घुसपैठिया माना जाता था, इसलिए लोदी वंश के पांचवें सुलतान इब्राहीन लोदी को भी विदेशी घुसपैठिया ही माना जाता था, देश के सारे रजवाड़े उसके विरुद्ध थे। जिनमें राणा सांगा भी थे। इब्राहीम लोदी 1517 में लोदी वंश के पांचवें शासक के तौर पर गद्दी पर बैठा था। उस समय दिल्ली के आसपास क्षेत्रीय क्षत्रप काफी मजबूत थे। अपनी पकड़ मजबूत करने और दिल्ली से देश चलाने के लिए इब्राहीम लोदी ने मुहिम शुरू की, अपना खजाना बढ़ाने के लिए करों का केन्द्रीयकरण किया। रसूखदार अफगान सरदारों को मारकर या कुछ को हटा कर अपने वफादारों को बिठाना शुरू कर दिया। उधर 1508 में तैमूर के शासक जहीरुद्दीन बाबर ने अपने चाचा उत्लुग बेग द्वितीय को उखाड़ फेंका और काबुल व गजनी पर कब्जा कर लिया, लेकिन फरगना, जो उसका जन्म स्थान था और समरकंद में बाबर को हार का सामना करना पड़ा। प्रसिद्ध इतिहासकार मार्क जासन गिल्बर्ट अपनी पुस्तक ‘साउथ एशिया वर्ल्ड हिस्ट्री’ में लिखते हैं कि बाबर को एक बात समझ आ गई थी कि मध्य एशिया में उसकी दाल नहीं गलेगी, इसलिए उसे भारत की ओर आगे बढ़ना चाहिए। बाबर की दृष्टि दक्षिण पूर्व पंजाब पर थी। यह बात 1519 की है कि बाबर चिनाब नदी पर पहुंच गया, इससे स्पष्ट है कि बाबर ने मध्य एशिया का सपना छोड़ दिया था। उसने अपना लक्ष्य भारत की ओर साध लिया था। दो वर्ष पहले 1517 में इब्राहीम लोदी दिल्ली की गद्दी पर बैठा था, एक जिद्दी राजकुमार अपने सरदारों को साथ लेकर नहीं चल सका।इतिहासकार सतीश चन्द्र ने मध्यकालीन भारत पर लिखी पुस्तक में लिखा है कि 1517 में दक्षिणी राजस्थान के हाड़ौती में इब्राहिम लोदी और राणा सांगा में हुई जंग में इब्राहिम लोदी हार गया। इसके बाद 1518 में राणा सांगा ने इब्राहीम लोधी की सेना को घौलपुर में हराया। राणा सांगा का हाथ तलवार से कट गया था, पैर में भी तीर लगा था, लेकिन उन्होंने इब्राहीम लोधी के विरुद्ध अपनी सेना का नेतृत्व जारी रखा और जीत प्राप्त की। इब्राहिम लोदी की स्थिति काफी कमजोर हो गई थी, क्योंकि सारे क्षत्रप उसके विरुद्ध हो गए थे। 23 सामंतों ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। पानीपत जिले की वेबसाइट में पानीपत की पहली लड़ाई का इतिहास लिखा है, समकालीन लेखक निमात्त्ला के हवाले से इस वेबसाइट में लिखा है कि इब्राहीम लोदी का महत्वाकांक्षी चाचा आलम खान दिल्ली से भाग गया, इब्राहीम खान का दूसरा चाचा दौलत खान, जो पंजाब का गवर्नर था, वह शासक की तरह व्यवहार करने लगा था। दौलत खान ने दिल्ली की गद्दी पर दावा ठोक दिया, जिसका कुछ सरदारों ने समर्थन कर दिया। जब इब्राहीम लोदी ने दौलत खान को नियंत्रण करने का प्रयास किया तो उसने बाबर से हाथ मिला लिया। इब्राहीम लोदी ने दौलत खान के बेटे दिलावर को कैद कर लिया, लेकिन वह भागने में सफल रहा। दौलत खान ने अपने बेटे दिलावर को बाबर के पास भेज कर उससे इब्राहिम लोदी को हराने के लिए सहायता माँगी। आलम खान ने भी अपने भतीजे के विरुद्ध बाबर से सहायता माँगी। जो दो लोग बाबर के पास गए थे, वे राणा सांगा के दूत नहीं, बल्कि इब्राहिम लोदी का चचेरा भाई दिलावर और चाचा आलम खान थे। इतिहासकार लिखते हैं कि इब्राहीम लोदी के अपने ही रिश्तेदारों ने बाबर से आग्रह किया कि वह इब्राहीम लोदी को उखाड़ फेंके। वे दिल्ली के बदले बाबर को पंजाब देने को तैयार थे। लेकिन बाबर ने बाद में पंजाब को ही दौलत खान, दिलावर खान और आलम खान में बाँट दिया और स्वयं दिल्ली का शासक बन गया। इस तरह लोदी वंश का अंत लोदी वंश के भितरघात के कारण हुआ, जहीरुद्दीन बाबर ने लोदी वंश को समाप्त करके मुगल राज की शुरुआत की।
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन अपने बयान के पक्ष में बाबरनामे का हवाला दे रहे हैं। बाबरनामे में लिखी इस बात का कोई तथ्यात्मक सबूत नहीं है कि राणा सांगा ने बाबर को इब्राहीम लोदी को हराने के लिए उनसे सहायता मांगी थी। बाबरनामा में लिखा है कि राणा सांगा ने उनके पास दूत भेज कर कहा था कि अगर वह दिल्ली पर हमला करते हैं, तो वह आगरा से हमला करेंगे। इसमें अगर शामिल है, यानि यह बात तो तय हो चुकी थी कि बाबर चिनाब नदी पर पहुंच चुका था, वह दिल्ली पर हमला करने वाला था, तो इसमें राणा सांगा ने उसे कैसे न्योता दिया। अगर बाबरनामे की बात सच होती तो राणा सांगा आगरा पर हमला करते, लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अगर राणा सांगा ने रणनीति का संकेत भेजा होगा, तो यह राणा सांगा की इब्राहिम लोदी को हरा कर पूरे उत्तर भारत में हिन्दू राज्य स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। राणा सांगा का लक्ष्य पूरे उत्तर भारत से विदेशियों को भगा कर हिन्दू राज्य स्थापित करना था, इसके लिए उन्होंने सभी हिन्दू राजाओं को एकजुट किया था। तो राणा सांगा को आशा रही होगी कि तैमूर लंग की तरह बाबर भी वापस लौट जाएगा और उत्तर भारत में हिन्दू राज्य स्थापित हो जाएगा, लेकिन कोई भी इतिहासकार इस बात की पुष्टि नहीं करता कि राणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को न्योता दिया था। क्योंकि राणा सांगा तो दो बार लोदी को हरा चुके थे।
राणा सांगा बहुत ही शक्तिशाली सेना के सेनापति थे, उन्होंने 1517 में मालवा के राजा महमूद खिलजी द्वितीय को भी हराया था और एक बड़े क्षेत्र पर कब्जा करके अपने जागीरदार मोदिनी राय को पूर्वी मालवा के एक बड़े हिस्से का शासक बना दिया था। इसी मालवा और चंदेरी क्षेत्र पर इब्राहीम लोदी की दृष्टि थी, क्योंकि एक समय चंदेरी के शासक ने लोदी सुलतान के प्रति निष्ठा प्रकट की थी। सभी इतिहासकार पूरी तरह असहमत हैं कि राणा सांगा ने बाबर को आमंत्रित किया। बल्कि कुछ इतिहासकारों का कहना है बाबर ने राणा सांगा से सहायता माँगी थी। इतिहासकार सतीश चन्द्र का कहना है कि राणा सांगा ने कोई आमन्त्रण नहीं दिया था, बल्कि लोदियों के साथ बाबर के संघर्ष का लाभ उठाने की आशा की थी, या यों कहें कि रणनीति बनाई थी। मुगल शासन के इतिहासकार जादूनाथ सरकार, जिन्होंने बाबर की डायरी का अनुवाद भी किया था, उन्होंने भी लिखा है कि बाबर का आक्रमण इब्राहीम लोदी के विद्रोहियों के साथ गठबंधन से प्रेरित था। राणा सांगा से बाबर का कोई एलायंस नहीं हुआ था। राष्ट्रीय रानजीति में मेवाड़ का प्रभाव’ के लेखक डाक्टर मोहन लाल गुप्त लिखते है कि ‘राणा सांगा भी इब्राहिम लोधी से युद्ध करना चाहते हैं, इसलिए आपको संधि पत्र भेजा गया है।’ बाबर ने उत्तर में लिखा था कि मैं उधर से दिल्ली पर आक्रमण करूंगा, उधर आप आगरा पर आक्रमण करें। यानि आगरा से युद्ध की बात राणा सांगा ने नहीं, बाबर ने कही थी। गौरी शंकर हीरा चंद ओझा लिखते हैं कि बाबर ने राणा सांगा से सहायता माँगी थी। गौरी शंकर होरा चंद ओझा लिखते हैं कि बाबर ने भारत पर आक्रमण का मन बहुत पहले बना लिया था। इतिहासकार सतीश चन्द्र लिखते हैं कि पानीपत की लड़ाई निर्णायक सिद्ध हुई, राणा सांगा को आशा थी कि बाबर काबुल लौट जाएगा। जिससे उत्तर भारत राजपूतों के नियन्त्रण में आ जाएगा। बाबर ने वापस जाने से इनकार कर दिया तब राणा सांगा ने राजपूतों और अफगान सेनाओं का विशाल गठबंधन बनाया। 1527 में खानवा की लड़ाई हुई, जिसमें राणा सांगा के शरीर पर 80 घाव हो गए थे, लेकिन इसके बाद भी वह बाबर से युद्ध की तैयारी कर रहे थे, इसलिए राणा सांगा को हिन्दुओं का गद्दार कहना गलत और अक्षम्य है। अगर उन्हीं के वफादार गद्दारी कर के उन्हें जहर देकर मार नहीं डालते, तो इतिहास कुछ और होता। शायद मुगल काल बहुत जल्दी ही समाप्त हो गया होता और 500 वर्ष क्रूर मुगल शासकों की परतंत्रता न सहनी पड़ती।