महादेव की अनंत भक्ति को दर्शाता शिवाड़ मेला

महादेव की अनंत भक्ति को दर्शाता शिवाड़ मेला

डॉ. अभिमन्यु

महादेव की अनंत भक्ति को दर्शाता शिवाड़ मेलामहादेव की अनंत भक्ति को दर्शाता शिवाड़ मेला

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में स्थित शिवाड़ नामक स्थान पर स्थित शिवालय को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री घुश्मेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंग माना जाता है। शिवाड़ स्थित ज्योतिर्लिंग को 12वां ज्योतिर्लिंग मानने के संदर्भ में विद्वानों के अलग अलग मत हैं। लेकिन शिव महापुराण कोटि रुद्र संहिता के अध्याय 32-33 के अनुसार घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय में स्थित है। प्राचीन काल में शिवाड़ को शिवालय के नाम से जाना जाता था। शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग अधिकांश समय जलमग्न रहने के कारण अदृश्य ही रहता है। 

शिवाड़ में स्थित घुश्मेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंग महादेव मंदिर में पांच दिवसीय मेले का शुभारंभ शिवरात्रि बुधवार, 26 फरवरी से प्रारंभ होकर 1 मार्च तक आयोजित किया जाएगा। मेले का शुभारंभ शोभा यात्रा एवं ध्वजारोहण के साथ होगा। सर्वप्रथम गौतम आश्रम से बैंड बाजे के साथ बाबा भोलेनाथ की शोभायात्रा निकाली जाएगी। इसके पश्चात मुख्य अतिथि विधि विधान एवं मंत्र उच्चारण के साथ पूजन कर मुख्य शिखर पर ध्वजारोहण करेंगे। इसी के साथ पांच दिवसीय शिवरात्रि महोत्सव अनंत भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ प्रारंभ हो जाएगा। शिवरात्रि पर यहां लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है तथा प्राणी सब पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

घुश्मेश्वर महादेव के प्रकट होने के पीछे एक पौराणिक कथा भी है।श्वेत धवल पाषाण देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नामक धर्मपरायण ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम सुदेहा था। लेकिन उनका जीवन संतान सुख से वंचित था। इस कारण पड़ोसियों के व्यंग्य बाण सुनने से व्यथित होकर पति का वंश चलाने हेतु सुदेहा ने अपनी छोटी बहन घुश्मा का विवाह अपने पति सुधर्मा के साथ करवाया।घुश्मा, भगवान शंकर की अनन्य भक्त थी। वह प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन-अर्चन कर उनका विसर्जन समीप के सरोवर में कर देती थी। आशुतोष की कृपा से घुश्मा ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया तो सुदेहा के हर्ष की सीमा नहीं रही। लेकिन बहिन घुश्मा के पुत्र के बड़े होने के साथ साथ उसे लगा कि उसके पति सुधर्मा का उसके प्रति आकर्षण एवं प्रेम कम होता जा रहा है। पुत्र के विवाह के उपरांत ईर्ष्या के कारण उसने घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी तथा शव को तालाब मे फेंक दिया। प्रात:काल जब घुश्मा की पुत्रवधू ने अपने पति (घुश्मा के पुत्र)की शय्या को रक्त रंजित पाया तो विलाप करती हुए उसने अपनी दोनों सासों को सूचना दी। विमाता सुदेहा जोर जोर से चीत्कार कर रोने लगी ,जबकि घुश्मा जो शिव पूजा में लीन थी, निर्विकार भाव से अपने आराध्य को श्रृद्धा सुमन समर्पित करती रही। सुदेहा, सुधर्मा व पुत्रवधू की मार्मिक चीत्कारें, विलाप एवं पुत्र की रक्त रंजित शैय्या भी घुश्मा के भक्तिरत मन में विकार उत्पन न कर सकी। घुश्मा ने सदैव की भांति पार्थिव शिवलिंगों का विसर्जन सरोवर में कर भगवान शंकर की स्तुति की, तो उसे पीछे से मां-मां की आवाज सुनाई दी, जो उसके प्रिय पुत्र की थी। जिसे मृत मानकर पूरा परिवार शोक कर रहा था। विस्मित घुश्मा ने उसे शिव इच्छा-शिव लीला मानकर भोले शंकर का स्मरण किया और महादेव द्वारा सुदेहा को दण्डित करने की बात पर धर्मपरायण घुश्मा ने भगवान से प्रार्थना की “प्रभु मेरी बहन को मत मारो, उसकी बुद्धि निर्मल कर दो, क्योंकि आपके दर्शन मात्र से कोई पातक नहीं ठहरता, इस समय आपके दर्शन करने से उसके पाप भस्म हो जाएंगे।” इस बात से प्रसन्न होकर बाबा भोलेनाथ प्रकट हुए तथा वरदान दिया कि आज से मैं तुम्हारे ही नाम से घुश्मेश्वर रूप में इस स्थान पर वास करूंगा तथा यह सरोवर शिवलिंगों का आलय हो जाएगा।                  

इस कथा से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि महादेव की अनन्य भक्ति करने वाले साधारण मनुष्यों की पुकार को महादेव अवश्य सुनते हैं तथा उन्हें इच्छित वर भी प्रदान करते हैं। इस प्रकार शिवाड़ में स्थित घुश्मेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंग एक भक्त की महादेव के प्रति अनंत समर्पण तथा अटूट विश्वास की कहानी को बयां करता है।

शिवाड़ का शिवरात्रि महोत्सव सम्पूर्ण संसार को आध्यात्मिकता, प्रकृति संरक्षण, स्वास्थ्य, कुटुंब प्रबोधन एवं सामाजिक समरसता का संदेश भी देता नजर आता है। शिवरात्रि को शिवस्य रात्रि भी कहा जाता है क्योंकि इस रात्रि में शिव ने अपना परमज्योतिर्मय रूप प्रकट करके ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार का दमन किया था, इस महोत्सव के माध्यम से महादेव समाज को भी अहंकार से मुक्त होकर विनम्रता के साथ जीवन जीने का रास्ता दिखाते हैं।        

शिवरात्रि महोत्सव पर महादेव भक्तजनों द्वारा उन्हें अर्पित किए गए केवल जल एवं बिल्वपत्रों से ही प्रसन्न हो जाते हैं, जो कि महादेव द्वारा अपने भक्तों को जल का सम्मान एवं प्रकृति संरक्षण करने की प्रेरणा देता नजर आता है। इसी दिशा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी पांच परिवर्तनों में से एक पर्यावरण संरक्षण की गतिविधि चला रहा है, जो समाज में प्रकृति संरक्षण के संबंध में जागृति पैदा कर रहा है। साथ ही, इसी दिन भक्तगण अपने महादेव को प्रसन्न करने के लिए उपवास भी रखते हैं। वैज्ञानिक प्रमाणों से भी स्पष्ट हो गया है कि उपवास रखने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, इस तरह यह महोत्सव स्वास्थ्य चेतना को भी बढ़ावा दे रहा है।

इसी तरह एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव और पार्वती का विवाह हुआ था, उनकी वर्षगांठ के उपलक्ष में यह दिन शिवरात्रि के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। शिव परिवार एक आदर्श परिवार का प्रतिनिधित्व करता है, शिवरात्रि महोत्सव के द्वारा भगवान शिव भी अपने भक्तों को कुटुंब प्रबोधन का संदेश देते नजर आते हैं। इसी से प्रेरणा पाकर संघ भी कुटुंब प्रबोधन का प्रकल्प चलाकर समाज को नई दिशा प्रदान कर रहा है।              

साथ ही शिवाड़ के शिवरात्रि महोत्सव में भक्तगण जाति, वर्ग- भेद, लिंग- भेद को भुलाकर शिवलिंग को जल अर्पित करते हैं, बिल्व पत्र चढ़ाते हैं और विभिन्न तरीकों से उनका श्रृंगार करते हैं। वहीं दूसरी ओर महादेव भी सभी भक्तों को बिना भेदभाव के उनकी इच्छा के अनुरूप आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पूरे विश्व में सामाजिक समरसता का इससे अच्छा उदाहरण और कहीं नहीं मिल सकता। इसी दिशा में संघ भी पांच परिवर्तनों में से एक सामाजिक समरसता द्वारा भेदभाव मुक्त हिंदू समाज का निर्माण करने में जुटा हुआ है।

स तरह शिवाड़ का शिवरात्रि महोत्सव समाज में सौहार्द एवं बंधुता को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है, वहीं भोलेनाथ अपने भक्तों को प्रकृति संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, आध्यात्मिक एवं नैतिक उन्नति तथा स्वास्थ्य चेतना की सीख दे रहे हैं। साथ ही घुश्मा जैसी असीम भक्ति की पराकाष्ठा की भावना में भाव प्रवण होकर लाखों भक्त शिवाड़ मेले को अलग ही अलौकिकता प्रदान करते हैं। इस तरह भगवान शिव की दयालुता एवं दिव्यता बरबस ही भक्तों को शिवाड़ में आने के लिए प्रेरित करती है।

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