The Diplomat : पाकिस्तान में भारतीय राजनयिक की कहानी

The Diplomat : पाकिस्तान में भारतीय राजनयिक की कहानी

दिवस गौड़

The Diplomat : पाकिस्तान में भारतीय राजनयिक की कहानीThe Diplomat : पाकिस्तान में भारतीय राजनयिक की कहानी

फिल्म के ट्रेलर अथवा विभिन्न मंचों पर परिचर्चाओं में फिल्म निर्माताओं द्वारा भले ही कहा गया हो कि इस फिल्म की कहानी पाकिस्तान में फंसी एक भारतीय मुस्लिम लड़की ओज्मा अहमद पर आधारित है। परन्तु मेरा आंकलन कहता है कि फिल्म पाकिस्तान में कार्यरत तत्कालीन भारतीय राजनयिक जेपी सिंह एवं भारतीय दूतावास में कार्यरत सभी भारतीयों के संघर्षों पर आधारित है।‌ फिल्म में साफ दिखाई देता है कि भारतीय दूतावास में किन कठिन परिस्थितियों में लोग कार्य कर रहे हैं। हर समय उन्हें स्वयं पर आक्रमण का भय लगा रहता है।‌ ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी जेपी सिंह एवं दूतावास में कार्यरत सभी भारतीयों ने ओज्मा अहमद को पाकिस्तान से बचा कर भारत तक सुरक्षित पहुंचाया।

फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित है, जिसमें सभी पात्रों के नाम भी सत्य ही हैं। कुछ नाम बदले गए हैं, परन्तु मुख्य किरदारों के नाम यथावत ही हैं। कालखंड है 2016-17 का, जब मलेशिया में एक भारतीय मुस्लिम लड़की ओज्मा अहमद (सादिया खतीब) एक पाकिस्तानी नागरिक ताहिर (जगजीत संधु) के प्रेम में पड़ जाती है एवं उसके बहकावे मे आकर पाकिस्तान चली जाती है। पाकिस्तान के खैबर पख्तुनख्वा के बुनेर नामक बेहद संवेदनशील शहर में ताहिर पहले से शादीशुदा है और ओज्मा से जबरदस्ती शादी कर उसे वहीं रख लेता है। हर दिन उसे पीटा जाता है। यौन शोषण किया जाता है। अनेक यातनाएं दी जाती हैं। ऐसे में ओज्मा किसी प्रकार इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास में शरण लेती है। अब किस प्रकार वह सुरक्षित भारत पहुंचती है, किस प्रकार जेपी सिंह उसकी सहायता करते हैं, किस प्रकार तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उसकी सहायता करती हैं, यह सब फिल्म में देखने योग्य है।‌

कहानी बहुत सधी हुई है। फिल्म कहीं से भी खींची हुई नहीं लगती।‌ भारतीय दूतावास में कार्यरत सभी भारतीयों का संघर्ष अद्भुत है। पाकिस्तान में किस प्रकार कानून का राज ना होकर देश को सेना, आईएसआई एवं आतंकवादियों द्वारा चलाया जा रहा है, यह स्पष्ट दिखाई देता है। फिल्म में दर्शाया गया है कि पाकिस्तान में साधारण नागरिकों विशेषकर महिलाओं के कोई मानवाधिकार नहीं हैं। बुनेर में बच्चे-बच्चे के हाथ में बंदूक है। चारों ओर हिंसा का बोलबाला है।‌ यहां तक कि इस्लामाबाद में भारतीय दूतावास में कार्यरत भारतीय कर्मचारी तक सुरक्षित नहीं हैं। हर समय आईएसआई इनके विरुद्ध षड्यंत्र करती रहती है।‌ दूतावास को कबाइली गिरोह द्वारा घेर कर रखा जाता है। ऐसे में वहां कार्यरत कर्मचारी किस भय में जीते होंगे, यह समझना कठिन नहीं है। फिर भी इन कठिन परिस्थितियों में वे अपना कार्य कर रहे हैं। फिल्म ने इन सभी पहलुओं को बहुत अच्छे से दिखाया है।

फिल्म का मुख्य किरदार ओज्मा अहमद नहीं अपितु जेपी सिंह (जॉन अब्राहम) हैं। जॉन ने इस किरदार को जीवंत कर दिया है। इसके लिए जॉन ने कुछ महीनों का समय जेपी सिंह (वर्तमान में इजरायल में भारतीय राजनयिक) के साथ बिताया। जॉन ने उनके बोलने के तरीकों, आदतों एवं बॉडी लैंग्वेज पर विशेष ध्यान दिया। जॉन ने फिल्म में जेपी सिंह के किरदार को निभाते समय इन बारीकियों का बहुत ध्यान रखा है। अपने अभिनय से जॉन ने बाटला हाउस के अपने किरदार की याद ताजा कर दी। ओज्मा अहमद के किरदार में सादिया ने भी बहुत अच्छा अभिनय किया है।‌ चेहरे के भावों पर उस ने बहुत मेहनत की है।‌ एक और किरदार, जो बहुत कम समय के लिए फिल्म में दिखा, परन्तु उसे बहुत सुन्दर तरीके से निभाया गया।‌ वह किरदार है तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का, जिसे निभाया है रेवती ने।‌ सुषमा स्वराज की जैसी साड़ी ही नहीं, बॉडी लैंग्वेज एवं भाव भंगिमाओं तक को यथावत उतारा है।

फिल्म में खैबर पख्तुनख्वा के प्राकृतिक दृश्य, जो संभवतः अफगानिस्तान व कश्मीर में फिल्माए गए हों, देखने लायक हैं।‌ गीत संगीत की कोई गुंजाइश नहीं थी इस फिल्म में। इसलिए कोई गीत है भी नहीं। पार्श्व संगीत भी फिल्म की कहानी के आधार पर संजीदा है।

पूरी फिल्म में कुछ भी क्रिंज नहीं लगता बस अंत में बाघा-अटारी बॉर्डर पहुंचते समय जेपी सिंह द्वारा स्वयं कार चलाना एवं आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ करना अतिशयोक्तिपूर्ण लगा। फिल्म रिलीज से पहले एक साक्षात्कार में जॉन अब्राहम ने स्वयं बताया था कि उन्होंने पांच प्रतिशत क्रिएटिव लिबर्टी का सहारा लिया है।

शिवम नायर का निर्देशन बहुत अच्छा लगा। उनके पुराने प्रोजेक्ट विशेषकर Special Ops की याद ताजा हो जाती है। प्रोडक्शन हाउस में टी सीरीज जैसा बड़ा नाम है एवं निर्माताओं में स्वयं जॉन अब्राहम, विपुल शाह, भूषण कुमार जैसे नाम सम्मिलित हैं। फिल्म फिलहाल सिनेमाघरों में है, उसके बाद स्क्रीनिंग राइट्स नेटफ्लिक्स के पास हैं।

फिल्म में सबसे विशेष बात इसकी तथ्यों की विश्वसनीयता है। फिल्म के अंतिम दृश्य में वास्तविक सुषमा स्वराज व जेपी सिंह के मध्य ओज्मा अहमद को बैठे देखना सुखद लगा, जहां वह अपने सुरक्षित भारत आगमन का श्रेय सुषमा स्वराज व जेपी सिंह को देती है।‌

एक बार फिल्म अवश्य देखी जानी चाहिए। फिल्म IMDb rating 7.9 है, परन्तु मैं 9.5 rating देना चाहूंगा।

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