ट्रम्प ने तो किसी का नाम नहीं लिया, कांग्रेस क्यों बचाव में आ गई?

ट्रम्प ने तो किसी का नाम नहीं लिया, कांग्रेस क्यों बचाव में आ गई?

अजय सेतिया 

ट्रम्प ने तो किसी का नाम नहीं लिया, कांग्रेस क्यों बचाव में आ गई?

ट्रम्प ने तो किसी का नाम नहीं लिया, कांग्रेस क्यों बचाव में आ गई?

एक जमाने में इंडियन एक्सप्रेस की तूती बोलती थी। हर संसद सत्र से ठीक पहले कोई न कोई ऐसा बम फोड़ दिया करता था कि विपक्ष को जोरदार मसाला मिल जाता था। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका को दबाने के बहुत प्रयास किए, लेकिन वह कभी किसी दबाव में नहीं आए। उन्होंने अपने संपादकों को खुली छूट दे रखी थी। उनके देहांत के बाद भी इंडियन एक्सप्रेस की वह धार बनी रही। लेकिन, इस सप्ताह अपने एक समाचार से इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी साख मिट्टी में मिला ली, जब उसने हेडलाइन समाचार छापा कि डोनाल्ड ट्रंप को भारत और बांग्लादेश में गलतफहमी हो गई। जिसे उन्होंने भारत को दिया गया फंड बताया है, असल में वह बांग्लादेश को दिया गया फंड था। कांग्रेस ने इस समाचार को ऐसे लपका, जैसे उसी की ओर से प्लांट किया गया समाचार हो। कांग्रेस ने जैसे पल्ला झाड़ने का प्रयास किया, उससे तो चोर की दाढ़ी में तिनका लगता है। न तो एलन मस्क ने कांग्रेस का नाम लिया था, न ही राहुल गांधी का। कांग्रेस क्यों बचाव में आ गई? जयराम रमेश और पवन खेड़ा ने इंडियन एक्सप्रेस के समाचार को ट्रंप के खंडन का आधार बनाया। इंडियन एक्सप्रेस ने ट्रंप के बयान की पृष्ठभूमि को भी पूरी तरह नजरअंदाज किया। कांग्रेस को तो नजरअंदाज करना ही था। बृहस्पतिवार को ट्रंप के बयान से चार दिन पहले एलन मस्क ने 14 देशों की 592 मिलियन डॉलर की फंडिंग रोकने के आदेश दिए थे। इनमें से 10 देशों में 486 मिलियन डॉलर की फंडिंग दूसरे देशों में राजनीतिक दखल की पुष्टि करती है। इसी लिस्ट में भारत को वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने के नाम पर 21 मिलियन डॉलर, बांग्लादेश में राजनीतिक परिदृश्य मजबूत करने के नाम पर 29 बिलियन डॉलर का स्पष्ट उल्लेख है। यह लिस्ट एलन मस्क ने बाक़ायदा अपने एक्स हैंडल पर शेयर की है, जिसे कोई भी जाकर देख सकता है। दुनिया भर के समाचार पत्रों में उस दिन वह लिस्ट छपी भी थी। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने लिख दिया कि ट्रंप को गलतफहमी हो गई।

ट्रंप ने बृहस्पतिवार के बाद शुक्रवार को भी अपनी बात को दोहराया। इंडियन एक्सप्रेस के समाचार और कांग्रेस प्रवक्ताओं के बयान के अगले दिन शनिवार को भी ट्रंप ने तीसरी बार वही बात कही कि बाइडेन प्रशासन ने भारत में किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए फंडिंग की। यह तथ्य भी पहले सामने आ चुका है कि 2012 में सोनिया गांधी की ओर से नियुक्त करवाए गए मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने जॉर्ज सोरोस के एनजीओ के साथ एमओयू साइन किया था। अमेरिका से फंडिंग जॉर्ज सोरोस की उसी संस्था के माध्यम से हो रही थी। इससे पहले कि पवन खेड़ा की ओर से जयप्रकाश नारायण और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अमेरिकी एजेंट बताए जाने पर बात की जाए। बता दें कि जिन अन्य आठ देशों को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए फंडिंग की जा रही थी, उनकी लिस्ट इस तरह है- माल्डोवा में सहभागी राजनीतिक प्रक्रिया के लिए 22 मिलियन डॉलर, मालदीव को राजनीतिक प्रक्रिया के लिए 22 मिलियन डॉलर, लाईबेरिया में वोटरों में विश्वास बढ़ाने के लिए 1.5 मिलियन डॉलर, माली में सामाजिक सामंजस्य के लिए 14 मिलियन डॉलर, दक्षिण अफ्रिका में समावेशी लोकतंत्र के लिए 2.5 मिलियन डॉलर, एशिया में सीखने की प्रक्रिया के लिए 47 मिलियन डॉलर, नेपाल में राजकोषीय संघवाद के लिए 20 मिलियन डॉलर और जैव विविधता वार्तालाप के लिए 19 मिलियन डॉलर, कोसोवो रोमा, अश्क्ली और मिस्र में विभिन्न समुदायों में सामंजस्य बढ़ाने के लिए 2 मिलियन डॉलर का उल्लेख है।

कांग्रेस के जिस नेता ने नारा लगाया था- मोदी तेरी कब्र खुदेगी, उसी पवन खेड़ा ने कहा है कि 1974 में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के पीछे अमेरिका का हाथ था। शायद उन्हें स्वतंत्रता के आंदोलन में जेपी की भूमिका का जरा भी ज्ञान नहीं है। जयप्रकाश नारायण प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। जवाहर लाल नेहरू के निमंत्रण पर वह 1929 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। 1930 के अवज्ञा आंदोलन में वह जेल में रहे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया था। जेल में ही कई स्वतंत्रता सेनानियों को लगा कि स्वतंत्रता के लिए भूमिगत हो कर क्रांतिकारी आंदोलन करना पड़ेगा। जयप्रकाश नारायण छह अन्य साथियों के साथ हजारीबाग जेल की दीवार से कूद कर बाहर आ गए थे। राहुल गांधी की यह नई कांग्रेस ऐसी बन गई है, जिसे हर वह स्वतंत्रता सेनानी देशद्रोही लगता है, जो कांग्रेसी नहीं है। फिर चाहे वह वीर सावरकर हों या जयप्रकाश नारायण। क्या अमेरिका के कहने पर जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया था। यह कहकर पवन खेड़ा आपातकाल लगने की पृष्ठभूमि और आपातकाल का बड़ी बेशर्मी से समर्थन कर रहे हैं। चन्द्रशेखर, मुलायम सिंह, बीजू पटनायक, चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल और करुणानिधि तो इस दुनिया में अब हैं नहीं। स्वयं को जयप्रकाश नारायण के अनुयायी बताने वाले लालू यादव को अवश्य कांग्रेस को बताना चाहिए कि जयप्रकाश नारायण क्या थे। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अमेरिका का एजेंट था तो 1980 से 1989 तक इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ही प्रधानमंत्री थे। क्यों नहीं संघ पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। उल्टे कांग्रेस को आपातकाल में लगाया गया संघ पर प्रतिबंध भी हटाना पड़ा, क्योंकि संघ के विरुद्ध कोई ऐसा सबूत नहीं था कि प्रतिबंध जारी रखा जा सकता।

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