संभाजी महाराज की हत्या के लिए औरंगजेब ने फाल्गुन अमावस्या का दिन ही क्यों चुना था?

गिरीश जोशी
संभाजी महाराज की हत्या के लिए औरंगजेब ने फाल्गुन अमावस्या का दिन ही क्यों चुना था?
फाल्गुन अमावस्या के दिन छत्रपति धर्मवीर संभाजी महाराज की 336 वीं पुण्यतिथि थी। क्या आप जानते हैं, संभाजी महाराज की हत्या के लिए औरंगजेब ने फाल्गुन अमावस्या का दिन ही क्यों चुना था? इसका उत्तर जानने के लिए आगे बढ़ते हैं। 14 मई 1657 को पुरंदर के किले पर छत्रपति संभाजी महाराज जन्म हुआ था। संभाजी महाराज ने शस्त्रों के साथ-साथ शास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया था। संस्कृत पर उनका प्रभुत्व इतना जबर्दस्त था कि उन्होंने राजनीति शास्त्र पर एक प्रख्यात ग्रंथ ‘बुधभूषण’ लिखा। काव्य के रूप में ‘नखशिख’ और ‘सप्तशतक’ उनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। 16 जनवरी 1681 को संभाजी का विधिवत राजाभिषेक हुआ। औरंगजेब का एक शहजादा अकबर संभाजी महाराज की शरण में आ गया। औरंगजेब को लगा कि यदि संभाजी और अकबर मिल गए तो मुगल सल्तनत के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकते हैं। उसने दोनों को समाप्त करने की इरादे से अपने दूसरे शहजादों और सरदारों को तीन लाख घुड़सवार, चार लाख पैदल सैनिक हजारों की संख्या में हाथी और ऊंट की फौज के साथ भेजा। साथ ही जंजीरा के सिद्दी और पुर्तगालियों को संभाजी पर आक्रमण करने का आदेश दिया। इधर संभाजी महाराज के पास गिनती के विश्वसनीय लोग और तीस से चालीस हजार सैनिक थे। 21 नवंबर 1681 को औरंगजेब बुरहानपुर पहुंचा। यहां उसने अब्दुल लतीफ खान की दरगाह पर कहा- ‘इस मुहिम का इरादा केवल जिहाद करना है, इस खिदमत से अल्लाह व पैगंबर खुश होंगे, दुष्ट दोजख जिसके नसीब में है, ऐसे संभा काफिर बच्चे को जीवित नहीं छोडूंगा।’ यह उसकी सोच थी।
संभाजी महाराज ने महाराज जयसिंह के पुत्र रामसिंह को संस्कृत में एक पत्र लिखा, जो आज भी जयपुर के संग्रहालय में उपलब्ध है। इस पत्र में संभाजी महाराज लिखते हैं ‘उस यवन औरंग को ऐसा लगने लगा है कि हम हिंदू सत्वशून्य हो चुके हैं, हमें अपने धर्म का कोई अभिमान नहीं बचा। बादशाह का यह व्यवहार हम सहन नहीं कर सकते। हम क्षत्रिय हैं, हमारे क्षात्रधर्म को नीचा दिखाने वाली कोई भी बात हम स्वीकार नहीं कर सकते। वेद, श्रुति और स्मृति आदि में धर्म के संबंध में अनेक कर्तव्य तय करके रखे हैं, हम उनकी अवहेलना सहन नहीं करेंगे। राजा के रूप में हम अपने प्रजा पालन का धर्म नहीं छोड़ सकते। अब वह समय आ गया है कि इस अधम यवन को पकड़कर कारागार में डालना संभव होगा। फिर अपने देवी- देवताओं को पुनः स्थापित कर धर्म कार्य निर्विघ्नता से पूर्ण होंगे, ऐसी व्यवस्था हम कर सकते हैं, और यह सब जल्दी करने का हमने निश्चय किया है।’
संभाजी महाराज की रणनीति के कारण औरंगजेब और उसकी फौज लगातार पांच वर्षों तक संघर्ष कर स्वराज्य का एक भी किला हासिल नहीं कर सके और न ही शहजादा अकबर को हाथ लगा पाए। अब औरंगजेब ने अपनी रणनीति बदल कर पहले आदिलशाही और कुतुबशाही को समाप्त करने का निर्णय लिया। जब मुगल सेना ने बीजापुर का घेरा डाल कर रखा था, तब कुछ मुसलमान मौलवी औरंगजेब से मिले और उसे इस्लामी राज्य के विरुद्ध लड़ाई करने के लिए मना किया, तब उसने जो उत्तर दिया, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। औरंगजेब ने कहा वह काफिर बच्चा संभा आपके गले में हाथ डालकर बैठा है, उसे आप लोगों से सहायता मिलती है। वह यहां से लगाकर दिल्ली दरवाजे तक इस्लाम को उखाड़ फेंकने में लगा है, उसे मेरे हवाले करो तो मैं घेरा हटा दूंगा। औरंगजेब की आदिलशाही और कुतुबशाही विजय के बाद स्वराज में छिपे बैठे गद्दार सक्रिय हो गए।
संभाजी महाराज अपने ही लोगों की गद्दारी के कारण मुगल सैनिकों के चंगुल में फंस गए। कैद में भी संभाजी महाराज ने बादशाह को सलाम करने से मना कर दिया और नजरों में नजरें मिलाकर औरंगजेब को देखते रहे।
यहां कवि कलश ने तत्काल एक काव्य रचा – ‘यवन रावण की सभा, संभू बंध्यों बजरंग। लहू लसत सिंदूर सम, खूब खेल्यों रनरंग, जो रवि छवि लखत हो, खद्योत होत बदरंग, त्यों तव तेज निहारी के तख्त तज्यों अवरंग।’
अर्थ – इस यवन रावण की सभा में संभाजी महाराज बजरंगबली की तरह बंदी हैं। लहू सिंदूर के समान रिस रहा है। खूब रणरंग खेला गया है। जिस तरह सूर्य की छवि को देखते ही अंधकार दूर भाग जाता है। ठीक उसी तरह संभाजी महाराज का तेज देखकर औरंग अपना तख्त छोड़ देता है।
कवि कलश की इस कविता से औरंगजेब का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसने कवि कलश की जुबान काटने की सजा सुना दी। अब संभाजी महाराज पर यातनाओं का दौर शुरू हुआ। औरंगजेब ने संभाजी महाराज की आंखें गर्म सलाखों से फोड़ने का आदेश सुनाया। अंतिम रूप से औरंगजेब ने संभाजी महाराज को इस्लाम कबूलने का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन संभाजी महाराज ने उसे भी ठुकरा दिया। औरंगजेब ने गुस्से में आकर संभाजी महाराज के हाथ और पैर तोड़ने के लिए जल्लादों को कहा। जब अनेक अत्याचारों के बाद भी संभाजी महाराज झुकने को राजी नहीं हुए, तब औरंगजेब ने 11 मार्च 1690 फाल्गुन मास को अमावस्या के दिन उनकी हत्या करने का आदेश सुनाया।
उसने फाल्गुन अमावस का दिन इसलिए चुना था क्योंकि दूसरे दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा आने वाली थी। इस दिन हिंदू अपने घरों पर भगवा ध्वज लगाते हैं। महाराष्ट्र में भगवा ध्वज के स्वरूप गुड़ी बनाकर घरों के ऊपर लगाई जाती है। औरंगजेब ने कहा था, मैं संभाजी के सिर की गुड़ी बनाकर चौराहे पर टांगूंगा। वह चाहता था कि इस दृश्य को देखकर पूरा हिंदू समाज दहल जाए, हिंदवी स्वराज का मनोबल टूट जाए और वह आसानी से पूरे हिंदवी साम्राज्य पर अपना कब्जा जमा सके।
छत्रपति संभाजी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के वचन स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः को जी कर करके दिखाया था। धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। इसलिए उनको धर्मवीर कहा जाता है। औरंगजेब को लगा था कि इस क्रूर हत्या के कारण अब मराठे किसी प्रकार का प्रतिकार नहीं करेंगे तथा औरंगजेब को यह भ्रम हो गया था कि दक्षिण की दो प्रबल शाहियों की तरह मराठेशाही भी अब समाप्त हो गई है। किंतु संभाजी महाराज के नेतृत्व में आठ वर्षों तक लड़ने के बाद मराठे राजाराम महाराज तथा तारारानी के नेतृत्व में औरंगजेब की फौज से लगातार सत्रह वर्षों तक लड़ते रहे। औरंगजेब को दक्षिण हिंदुस्तान में सफलता तो मिली ही नहीं, उल्टे लगभग पच्चीस वर्षों से उत्तर हिंदुस्तान से दूर रहने के कारण मुगल साम्राज्य का बड़ी तेजी से पतन होने लगा। लगातार पराजय की खबरों से और अपने परिजनों की मौतों से औरंगजेब बेहाल हो चला था। दिनोंदिन उसका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया। अंततोगत्वा 20 फरवरी 1707 को निराशा हताशा की अवस्था में औरंगजेब की मृत्यु हुई।
आज हमें हर वर्ष प्रतिपदा उत्सव पर छत्रपति संभाजी महाराज और उनके जैसी अन्य हुतात्माओं का स्मरण करना चाहिए, जिनके अमूल्य बलिदान के कारण ही हम यह उत्सव हर्ष और उल्लास के साथ मना पा रहे हैं।
(लेखक संस्कृति अध्येता एवं अकादमिक प्रशासक है)