जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अजमेर में क्यों लागू नहीं हो पा रहा ‘भीलवाड़ा मॉडल’?

प्रदेश के कोरोना संक्रमित शहरों में आखिरकार ‘भीलवाड़ा मॉडल’ अपनी रफ्तार क्यों नहीं पकड़ पाया? प्रशासन, सरकार, चिकित्साकर्मी, पुलिसकर्मी, स्वच्छताकर्मी सभी तो वही हैं। फिर..? दो कारण हैं। पहला, प्रशासन को यह समझने की जरूरत थी कि भीलवाड़ा की आबादी के मूलभूत स्वभाव और कोरोना से सर्वाधिक संक्रमित शहरों के विशेष क्षेत्रों की आबादी के मूलभूत स्वभाव में गहरा अंतर है। दूसरा और प्रमुख कारण- सियायत की तुष्टीकरण की नीति।

–    कुमार नारद

आज से महीने भर पहले राजस्थान से लेकर दिल्ली तक सबकी जुबान पर कोरोना से लड़ने के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा मॉडल की सफलता के चर्चे थे। लेकिन जैसे ही जयपुर के रामगंज और जोधपुर का नागौरी गेट, अजमेर का दरगाह बाजार क्षेत्र और कोटा का घंटाघर कोरोना वायरस का एपिसेंटर बने, सियासत के लोग भीलवाड़ा मॉडल की चर्चा करना भूल गए। अब तक सरकार और प्रशासन को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर इन क्षेत्रों में कौन सा मॉडल लागू किया जाए, कि कोरोना संक्रमण की बढ़ती संख्या को नियंत्रण में लाया जा सके। राजस्थान में विपक्षी दल के स्थानीय और केंद्रीय स्तर के नेता प्रदेश सरकार पर लॉकडाउन और कर्फ्यू की पालना से लेकर राशन वितरण में तुष्टीकरण के आरोप लगाते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने पिछले दिनों पत्रकारों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बातचीत में गहलोत सरकार पर सीधे आरोप लगाए कि गहलोत राजनैतिक मजबूरियों को छोड़ें और जयपुर तथा जोधपुर में पूर्णबंदी का सख्ती से पालन करवाएं। उन्होंने यहां तक कहा कि इसके लिए जरूरत पड़ने पर केंद्रीय रिजर्व बल लगाएं। लेकिन क्या यह संभव है….?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोरोना संक्रमण रोकने में ‘भीलवाड़ा मॉडल’ सफल रहा है और उसका श्रेय लेने के लिए मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी अध्यक्षा और शीर्ष पदाधिकारियों ने ट्विटर से लेकर पत्रकार वार्ताओं में खूब बातें भी कीं। लेकिन जब से जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अजमेर के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जिस तेजी से कोरोना संक्रमण का प्रसार हुआ, उसके बाद सरकार और स्थानीय प्रशासन के हाथ-पांव फूलने लगे। उन क्षेत्रों में भीलवाड़ा मॉडल कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि राजस्थान में संक्रमितों की संख्या बढ़कर (15 मई 2020) 4688 हो गई है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार इनमें 70 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमित व्यक्ति मुस्लिम समुदाय से हैं।

छब्बीस मार्च तक जयपुर में कोरोना वायरस का एक मामला था। ओमान से आए एक व्यक्ति के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने पूरे जयपुर को एक महीने पीछे धकेल दिया है। जयपुर रेड जोन में है। लगभग पूरा जयपुर शहर गैर जिम्मेदार लोगों की लापरवाही को भुगत रहा है। शहर की चारदीवारी में कर्फ्यू लगाया हुआ है। कर्फ्यू और लगातार कथित निगरानी के बावजूद जयपुर में संक्रमण बढ़ता गया और यह देश के उन शहरों में शामिल हो गया जहां संक्रमण के सर्वाधिक मामले हैं। पंद्रह मई शाम तक जयपुर में 1373 से ज्यादा सक्रिय मामले थे। इनमें भी नब्बे प्रतिशत से ज्यादा संक्रमित व्यक्ति मुस्लिम समुदाय से हैं। यही स्थिति जोधपुर की है। यहां शहर के परकोटे के भीतर नागौरी गेट, उदयमंदिर, जालोरी गेट और खांडा पलसा क्षेत्र में कोरोना के खतरनाक संक्रमण के कारण कर्फ्यू लगाया गया है। ये सभी क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य हैं और जनसंख्या के लिहाज से बहुत घने हैं। इन सभी क्षेत्रों में कर्फ्यू के बावजूद कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है। जोधपुर में कोरोना संक्रमण का प्रसार जमात के लोगों से शुरू हुआ और आज जोधपुर प्रदेश का दूसरा ऐसा जिला हैं जहां सबसे ज्यादा कोरोना के मरीज हैं। पंद्रह मई तक जोधपुर में कुल सक्रिय मामले 967 थे। यह खुद मुख्यमंत्री का क्षेत्र है। लेकिन स्थानीय लोग दबी जुबान में कहते हैं कि ऐसा लगता है पुलिस प्रशासन के हाथ बंधे हुए हैं। उनकी सक्रियता सिर्फ दिखाने भर की है। लेकिन यदि सख्ती नहीं बरती जाएगी तो पूरा जोधपुर शहर मौत के मुहाने पर पहुंच जाएगा। लेकिन प्रशासन सियासत की और सियासत तुष्टीकरण की सीमा रेखा में बंधा है।
अजमेर और कोटा भी तुष्टीकरण की नीति का कोरोना फल साबित हो रहा है। कोरोना संक्रमण के दौर के काफी दिनों बाद अजमेर का नंबर आया। यहां भीलवाड़ा के कर्फ्यू के माहौल में से कुछ व्यवस्था कर निकले एक सेल्समैन नावेद ने अजमेर को कोरोना भेंट किया। वह पहले अजमेर पहुंचा और अपने परिवार के पांच लोगों को कोरोना भेंट किया। कोरोना की यह भेंट अजमेर का दरगाह बाजार, केसरगंज, मुस्लिम मोची मोहल्ला और दरगाह बाजार के आसपास की कॉलोनियों, बाजारों में बंटती गई। फिर कर्फ्यू के बावजूद मेल मिलाप से इन क्षेत्रों में कोरोना का प्रसार हुआ। प्रशासन ने कर्फ्यू लगाया। इसके बावजूद संक्रमण बढ़ता गया। अप्रैल के पहले सप्ताह में यहां तीस से चालीस केस थे, जो अब बढ़कर 244 हो गये हैं। इनमें भी 90 प्रतिशत से ज्यादा मरीज मुस्लिम समुदाय से हैं।

आइए अब कोरोना संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित कोटा चलते हैं। कोरोना संक्रमण और उसे रोकने के उपाय पूरे राजस्थान में एक ही ट्रेंड पर चल रहे हैं। कोटा इससे अलग कैसे हो सकता है। यहां भी कोरोना का संक्रमण लेकर आने वाला पहला व्यक्ति जयपुर जमात से जुड़ा एक ड्राइवर था। फिर..? शहर के परकोटे के भीतर घंटाघर, मकबरा, पाटनपोल, कैथुनीपोल जैसे मुस्लिम क्षेत्रों में कोरोना यहां स्थायी मेहमान बनकर बैठ गया। प्रशासन और सरकार की अपीलों को एक तरफ रख मेल-मिलाप चलता रहा। पांच-छह अप्रैल को आए पहले केस के बाद कोटा में अब तक (पंद्रह मई 2020) 318 मामले आ चुके हैं। यहां भी वही ट्रेंड है। नब्बे फीसदी संक्रमित एक ही समुदाय से हैं। उदयपुर में भी कर्फ्यूग्रस्त इंदौर की सुरक्षा दीवार को तोड़कर मुस्लिम समुदाय का एक व्यक्ति कोरोना बम बनकर यहां पहुंचा और देखते ही देखते उदयपुर के हेला मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र कांजी का हाटा (हेलाबाड़ी) में कोरोना का जबरदस्त विस्फोट हो गया। सात मई को एक साथ 59 मामले सामने आए। फिर बढ़ते बढ़ते पंद्रह मई तक यह आंकड़े 354 हो गए। उदयपुर तो भीलवाड़ा की सीमा से भी लगता है।

इन शहरों में आखिरकार भीलवाड़ा मॉडल अपनी रफ्तार क्यों नहीं पकड़ पाया? इन शहरों के क्षेत्र विशेष में उसकी सांसें क्यों फूल जाती हैं? प्रशासन, सरकार, चिकित्साकर्मी, पुलिसकर्मी, स्वच्छताकर्मी सभी तो वही हैं। फिर..? दो वजह हैं, जो साफ साफ नजर आती हैं। लेकिन संभव है सियासत जानबूझकर आंखे मूंदे हुए है। पहला, प्रशासन को यह समझने की जरूरत थी कि भीलवाड़ा की आबादी के मूलभूत स्वभाव और प्रदेश के कोरोना से सवार्धिक संक्रमित शहरों के मुस्लिम क्षेत्रों की आबादी के मूलभूत स्वभाव में गहरा अंतर है और उसी के अनुसार अपना मॉडल तय करना चाहिए। दूसरा सियासत की तुष्टीकरण की विवशता। इन शहरों के स्थानीय लोग बताते हैं कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने की वजह से सरकार लॉकडाउन और कर्फ्यू का सख्ती से पालन करवाने में पूरी तरह विफल रही है। राजस्थान में विपक्षी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पार्टी के स्थानीय और केंद्रीय नेता भी गहलोत सरकार से कोरोना नियंत्रण के लिए तुष्टीकरण की नीति को छोड़कर सख्ती से लॉकडाउन की पालना के लिए कह चुके हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि वह लॉकडाउन की पालना में न धर्म देखती है और न जाति। लेकिन सवाल खड़ा होता है, फिर क्यों इन शहरों में भीलवाड़ा मॉडल पंचर हो रहा है? क्यों भीलवाड़ा का मॉडल यहां आकर तुष्टीकरण की सीमा रेखा को लांघने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है?

कोरोना जैसी महामारी से लड़ने के दौरान जब पुलिस-प्रशासन पर जब सियासत हावी हो और सियासत के गले में तुष्टीकरण माला पड़ी हो तो फिर चाहे भीलवाड़ा मॉडल हो या वुहान मॉडल, वह लफ्फाजियों में ही दम तोड़ देता है। इसलिए किसी महामारी से लड़ने में अगर तुष्टीकरण की नीति आड़े आती है, तो हमें समझना चाहिए कि राजनीति की हमारी यात्रा अभी अधूरी है।

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