राजस्थान में हो रहा मुस्लिमों का तुष्टीकरण

– तनया गड़करी

आओ सा! झूठे सेक्युलरवाद के तराने गाएँ।
पधारो सा! स्वाभिमान पर लगे गहरे घावों को छिपाएँ।
विराजो सा! न्याय को तौलें वोटबैंक के तराजू पर..
हुकम करो! महिला सम्मान को तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाएँ।

यूँ चौंकिए नहीं; यह आज के राजस्थान का कड़वा सच है।

एक समय राजस्थान शौर्य, स्वाभिमान, बलिदान और स्त्री सम्मान के कारण विश्व भर का सिरमौर रहा.. आज यही प्रदेश नाबालिग बच्चियों के साथ गैंगरेप और अपराधियों को उनकी मजहबी पहचान के आधार पर बचाने के कुत्सित प्रयासों को सिर झुकाए देख रहा है।

अधिक पुरानी घटना नहीं है। लगभग 2 सप्ताह पहले, 5 मई को टोंक के बाछेड़ा गाँव से एक नाबालिग किशोरी का अपहरण कर उसे पड़ोस के गाँव ले जाया जाता है। 4 दरिंदे रात भर उसके साथ जघन्यता करते हैं और सुबह उसके बेहोश शरीर को मृत मानकर फेंक जाते हैं।

आश्चर्य की बात है कि यह सब लॉक डाउन के दौरान हुआ जब पुलिस मुस्तैद थी, सर्वत्र निजी वाहनों के आवागमन पर रोक थी और अपहरण में प्रयुक्त कार को सरलता से पहचान लिए जाने की पूरी संभावना थी! तो आखिर क्यों अपराधी इतना निश्चिंत थे? क्यों उनके मन में सरकार, पुलिस, प्रशासन व न्यायतंत्र के प्रति कोई भय नहीं रह गया था?

उत्तर है- वर्तमान राजस्थान सरकार का कथित सेक्युलरवाद।

चूंकि चारों अपराधी मुस्लिम हैं तथा 100% मुस्लिम आबादी वाले गाँव इस्लामपुरा से हैं। यहीं पर बालिका के साथ दरिंदगी की गई। क्षेत्र में इस्लामपुरा और इस्लामनगर नाम के 2 पूर्णतः मुस्लिम गाँव हैं जो अपराध तथा गो तस्करी के लिए कुख्यात हैं।

अपनी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की (अ)नीति के चलते प्रदेश सरकार 2 दिनों तक इस अपराध के प्रति आँखें मूंदकर बैठी रही। बाद में सर्वसमाज द्वारा आक्रोश प्रकट करने पर किसी तरह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इस पर भी पीड़िता व उसके परिवारजनों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। प्रत्येक स्तर पर उन्हें प्रताड़ित किया गया। संबंधित महिला चिकित्सक ने मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता की उम्र 19 वर्ष लिखी और मौखिक रूप से उसे चरित्रहीन कहा। पुलिस उपाधीक्षक ने पीड़िता पर दबाव बनाया कि वह चारों में से केवल एक आरोपी का नाम ले। 161 का बयान लेते समय गैरकानूनी रूप से पीड़िता को किसी भी पारिवारिक सदस्य की अनुपस्थिति में अकेला रखा गया।

प्रशासन का यह कुकृत्य बाहर आने पर जब सर्वसमाज ने मिलकर स्थानीय विधायक कन्हैयालाल चौधरी तथा सांसद सुखबीर सिंह के साथ धरना देकर एसडीएम को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा तो उन्हीं पर लॉक डाउन तोड़ने समेत विभिन्न धाराओं में मुकद्दमे दर्ज कर लिए गए!

माननीय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी तो ‘कथनी और करनी में अंतर’ का चलता-फिरता उदाहरण बन चुके हैं! एक ओर वे महिला सम्मान के लिए पर्दा ( केवल घूंघट, बुर्का नहीं) हटाने की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में समुदाय विशेष की संलिप्तता पर पर्दा डाल रहे हैं। रहे उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट.. जो मुस्लिम वोट बैंक पर इतने आसक्त हैं कि न तो उन्होंने पीड़ित बालिका की सुध ली और न ही उन्हें अपने ही समाज के आक्रोश की परवाह है जिसके बल पर वह सत्ता तक पहुँचे हैं।

वर्तमान सरकार के इस दुराग्रह ने प्रदेश में हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रख दिया है।

अब तो यहाँ कोई रफीक किसी मन्नू लाल वैष्णव को केवल इसलिए कुल्हाड़ी से काट देता है क्योंकि उन्होंने अपना नियत पारिश्रमिक मांग लिया था। उनकी हत्या के बाद न्याय मांगने वालों पर सरकार ने खुद लाठियाँ चलवाई।

जोधपुर के युवक जोरावर सिंह को चाकू से गोदकर मार डाला गया क्योंकि उसने सड़क पर हंगामा मचा रहे समाज कंटकों का विरोध किया जो मुस्लिम समुदाय के थे।

आज के राजस्थान में आप तब तक ही दलित हैं, जब तक मजहबी भीड़ आपको पीट-पीटकर मार नहीं डालती। अलवर के हरीश जाटव की मॉब लिंचिंग हुई। उनके बूढ़े-लाचार पिता रत्तीराम जी फाँसी पर लटके पाए गए और गहलोत सरकार के दबाव में इसे आत्महत्या बताया गया। लाल सलाम का शोर मचाने वाले दलित अधिकार संगठन आगे नहीं आए। समुदाय विशेष के प्रति उनका समर्पण जगजाहिर है।

निजी फार्महाउस में जन्मदिन और 370 हटने की खुशी मनाते युवकों को इमरान नामक युवक ने गोली मार दी।

जब 10 वर्षीया मासूम के साथ बलात्कार की खबर पर पूरा प्रदेश रो रहा था तभी मुस्लिमों ने जयपुर में बिना किसी सुबूत के हिंदुओं के कई घरों, दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया। बाद में बलात्कारी उन्हीं के बीच में छिपा हुआ ‘सिकंदर’ निकला। इस धृष्टता के लिए न तो समुदाय विशेष ने हिंदुओं से माफी मांगी और ना ही सरकार ने किसी मुआवजे का प्रावधान किया।

हमारा कथित सेक्युलर मीडिया तो कथित सेक्युलर सरकार से भी 2 कदम आगे निकल गया! उपरोक्त प्रत्येक घटना राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आने से पहले ही पूरी निर्लज्जता से दबा दी गई।

टोंक के नाबालिग गैंगरेप प्रकरण में भी ‘द प्रिंट’ और ‘ऑल्ट न्यूज़’ को बालिका की पीड़ा से कोई लेना देना ही नहीं है! वे तो दुनिया को यह बताकर खुश हैं कि पीड़िता के समर्थन में किए जाने वाले ट्वीट्स के साथ जो फोटो वायरल हुई, वह फेक है! यह वही मीडिया है जो दंगों के दौरान हिंदुओं द्वारा भ्रूण को तलवार की नोंक पर उछालने जैसी मनगढ़ंत कहानियाँ बरसों तक चलाता रहा!

तो आखिर जनता किससे आशा रखे? किसके सामने न्याय मांगे? क्या अब राजस्थान में समुदाय विशेष से होना ही मासूम होने का प्रमाणपत्र है?

क्या अब यहाँ हिंदू होना मात्र ही अपराध है? क्या हिंदुआ सूरज की धरती अपने स्वाभिमान का अपमान चुपचाप सहती रहेगी? हम इतिहास बनाएंगे या इतिहास बन जाएंगे?

हमारी वर्तमान भूमिका ही तय करेगी हमारा भविष्य।

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